हो रही है आज ,
दुर्दशा इस देश की ।
समझे ना अब कोई,
भाषा यहां प्रेम की ।
धर्म मजहब जाति ने ,
धरा रूप गंभीर है ।
अब ना कोई पीर पैगंबर ,
ना कोई फकीर है ।
अब ना कोई राम यहां ,
बस रावण का राज है ।
ना कोई अर्जुन यहां ,
अंधों के सिर पर ताज है ।
लाज द्रोपति की बचाने
ना कृष्ण कोई आएगा ।
अब की बार दांव पर
वो 'भविष्य 'भी हार जाएगा ।
धन्यवाद
BY: - SATNAM KAUR

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