Tuesday, August 25, 2020

**दुर्दशा**

 


हो रही है आज ,

दुर्दशा इस देश की

समझे ना अब कोई,

भाषा यहां प्रेम की

        धर्म मजहब जाति ने ,

        धरा रूप गंभीर है

        अब ना कोई पीर पैगंबर ,

        ना कोई फकीर है

अब ना कोई राम यहां ,

बस रावण का राज है

ना कोई अर्जुन यहां ,

अंधों के सिर पर ताज है

        लाज द्रोपति की बचाने 

        ना कृष्ण कोई आएगा

        अब की बार दांव पर 

        वो 'भविष्य 'भी हार जाएगा

 

 धन्यवाद

BY: - SATNAM KAUR

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