छुट्टी तो आती है पर कोई आराम नहीं आता,
क्यों औरत के हिस्से में उसका इतवार नहीं आता ।
देखो देखो सुबह हो गई सरपट सरपट भाग रही ,
सब तेरा ही है पगली यह सोचकर नाच रही।
फिर भी कोई चूक हुई तो सुनती काम नहीं आता ,
क्यों औरत के हिस्से में उसका इतवार नहीं आता ।
एक अकेली नार यहां पर जाने क्या-क्या काम करें ,
उसका कुछ भुगतान करें तो शायद तुम को पता चले ।
घर की स्त्री को साहब कोई व्यापार नहीं आता,
क्यों औरत के हिस्से में उसका इतवार नहीं आता ।
सोती है वह आखिर में और सबसे पहले जागती है,
होती है वह पीड़ा में फिर भी देखो हंसती है।
उसकी इच्छाओं का क्यों तुमको ध्यान नहीं आता ,
क्यों औरत के हिस्से में उसका इतवार नहीं आता ।
कामनी
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